लालटेन की चमक और लोभ का पाठ | Lantern Glow Greed Moral Story in Hindi | Panchatantra Kahani | लोभ की सजा

लालटेन की चमक और लोभ का पाठ | Lantern Glow Greed Moral Story in Hindi | Panchatantra Kahani | लोभ की सजा

लालटेन की चमक और लोभ का पाठ

एक छोटे से गांव में चार गरीब युवक दोस्त रहते थे—रामू, श्यामू, कान्हा और मोहन। सबकी जिंदगी कंगाली से तंग आ चुकी थी। दोस्तों ने सोचा, "गरीबी में तो अपनों से भी मुंह मोड़ लिया जाता है। धन के बिना न सम्मान, न सुख। धनी हो तो कहीं भी राजा जैसा दर्जा मिल जाता है।

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धन कमाने के इरादे से उन्होंने गांव छोड़ा और यात्रा शुरू की। रास्ते में एक घने जंगल के किनारे वे पहुंचे। वहां एक प्राचीन मंदिर में स्नान-पूजा की। तभी उन्हें एक लंबे दाढ़ी वाले संन्यासी मिले, जिनका नाम था स्वामी हरिदास। संन्यासी ने पूछा, "बेटों, इतनी दूर क्यों भटक रहे हो?


युवकों ने कहा, "स्वामीजी, हम अमीर बनने चले हैं। या तो धन लाएंगे या जान गंवाएंगे। गरीबी से मौत बेहतर है।


स्वामी मुस्कुराए। बोले, "भाग्य धन देता है, लेकिन मेहनत और हिम्मत से उसे पकड़ा जा सकता है। लो, ये जादुई लालटेन लो। हिमालय की ओर जाओ। जहां लालटेन अपनी आप गिर जाए, वहीं खुदाई करो। वहां धन मिलेगा। लेकिन लोभ न करना!



चारों लालटेन थामे चल पड़े। थोड़ी दूर पर रामू की लालटेन गिर गई। खुदाई की तो तांबे का भंडार निकला। रामू खुश हो गया, "बहुत तांबा लूंगा, इससे काम चलेगा!" लेकिन बाकी बोले, "नहीं भाई, ये तो छोटा-मोटा है। आगे कुछ बेहतर मिलेगा।" रामू वहीं रुक गया, तांबा भरा और घर लौट आया।


श्यामू, कान्हा और मोहन आगे बढ़े। श्यामू की लालटेन गिरी। खुदाई पर चांदी का ढेर! श्यामू बोला, "ये तो कमाल है! रुक जाओ यारों।" लेकिन बाकी दो बोले, "पहले तांबा, अब चांदी—अगला सोना होगा!" श्यामू वहीं रुक गया, चांदी लादकर लौट गया।



कान्हा और मोहन चले। कान्हा की लालटेन गिरी—सोने की खदान! कान्हा बोला, "बस, यहीं रुकते हैं। सोना तो राजाओं का धन है!" मोहन ने टोका, "पहले तांबा, चांदी, सोना—अगला हीरा-रत्न होगा! चल आगे।" कान्हा न माना, सोना भरकर चला गया।


मोहन अकेला बर्फीली चोटियों पर चढ़ता रहा। पैर कट गए, शरीर थक गया, लेकिन लालच ने हिम्मत दी। आखिर एक गुफा में पहुंचा, जहां एक घायल साधु खून से लथपथ बैठा था। उसके सिर पर चमकता चक्र घूम रहा था।
मोहन ने पूछा, "बाबा, ये क्या? और पानी कहां मिलेगा, प्यास लगी है?


इतने में चक्र साधु के सिर से उतर मोहन के सिर पर चढ़ गया! साधु हंस पड़ा, "बेटा, ये लोभियों का श्राप है। ये तब तक घूमेगा जब तक कोई और लालची यहां न आए। राजा दशरथ के जमाने से मैं यहीं हूं। भूख-प्यास नहीं लगती, बस ये चक्र सताता है। अनंत काल तक यही हाल!


साधु चला गया। मोहन चक्र के दर्द में कराहता वहीं रह गया। बाकी तीन दोस्त अमीर होकर खुशहाल जिंदगी जीते रहे, लेकिन लोभ ने मोहन को अमर कष्ट दिया।


सीख: संतोष धन है, लोभ विनाश। जो मिल जाए, उसी में खुश रहो

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