राक्षस की भयानक भूल | रत्नावती चोर बन्दर कहानी | Panchatantra Moral Story in Hindi | राक्षस घोड़ा चोर | Hindi kahania
एक समय की बात है, एक नगर में भद्रसेन नाम का एक पराक्रमी राजा राज करता था। उसकी एकमात्र पुत्री थी — राजकुमारी रत्नावती। वह अत्यंत सुंदर, सुसंस्कृत और विनम्र थी। किंतु उसकी एक कमजोरी थी — उसे हर समय डर बना रहता था कि कोई राक्षस उसका अपहरण न कर ले।
दिन-रात महल के चारों ओर सैकड़ों सैनिक तैनात रहते, फिर भी राजकुमारी भयभीत रहती। रात होते ही उसका डर और बढ़ जाता, जैसे अंधेरा उसके हृदय में उतर आता हो।
एक रात की घटना है — आकाश में बादल छाए थे, महल के चारों ओर सन्नाटा पसरा था। तभी एक चालाक राक्षस महल की सुरक्षा पार कर अंदर घुस आया। वह अंधेरे कोने में छिपा प्रतीक्षा करने लगा। उस समय रत्नावती अपनी सहेली से बात कर रही थी।
वह बोली — यह दुष्ट विकाल हर वक्त मुझे डराता रहता है। काश इसका कोई उपाय होता!
राक्षस ने यह सुना तो उसके मन में भ्रम हो गया। उसने सोचा — लगता है यह रत्नावती उस विकाल नाम के किसी भयंकर राक्षस से भयभीत है। मुझे पता लगाना होगा कि यह विकाल कौन है और कितना शक्तिशाली है।
सोचते-सोचते उसने अपने रूप को बदलकर घोड़े का रूप धारण कर लिया और महल की अश्वशाला (घोड़ा बाड़ा) में जा छिपा।
रात और गहरी हुई तो एक चोर महल में घुस आया। उसका इरादा घोड़े चुराने का था। वह घोड़ों को देखने लगा और उसे सबसे सुंदर घोड़ा वही लगा जो वास्तव में राक्षस था। उसने बिना देर किए उसकी पीठ पर कूदकर सवारी कर ली।
अब राक्षस को भ्रम हुआ — यह वही विकाल होगा! मुझे पहचानकर मेरी हत्या करने आया है!
लेकिन अब स्थिति उसके बस में नहीं थी — चोर ने लगाम पकड़ ली थी और हाथ में चाबुक था। चाबुक पड़ते ही घोड़ा तेजी से दौड़ पड़ा।
काफी दूर तक भागते हुए जब चोर ने लगाम खींची तो घोड़ा रुका नहीं। अब चोर को शक हुआ, यह कोई साधारण घोड़ा नहीं, जरूर कोई दैत्य है!
तभी सामने एक बड़ा बरगद का पेड़ दिखा। उसने मौका देखकर उसकी शाखा पकड़ ली और ऊपर लटक गया, घोड़ा नीचे से निकल गया।
उस पेड़ पर एक बंदर रहता था जो राक्षस का मित्र था। उसने नीचे झांककर कहा —
अरे मूर्ख! डर क्यों रहा है? वह आदमी कोई राक्षस नहीं, सिर्फ एक साधारण चोर है। चाहो तो एक पल में उसे निगल सकते हो!
चोर को अब बंदर पर गुस्सा आया। बंदर ऊँचाई पर था, मगर उसकी लंबी पूँछ चोर के पास तक झूल रही थी। चोर ने झपटकर उसकी पूँछ को दाँतों से पकड़ लिया और जोर से काट लिया।
बंदर दर्द से कराह उठा, पर राक्षस के सामने कमज़ोरी नहीं दिखाना चाहता था। पर उसका चेहरा पीड़ा से विकृत हो गया।
यह देखकर राक्षस बोला — मित्र, चाहे तुम कुछ कहो या न कहो, लेकिन तुम्हारा चेहरा तो बता रहा है — तुम विकाल राक्षस के ही नियंत्रण में हो गए हो!
इतना कहते ही राक्षस भयभीत होकर जंगल की ओर भागा और फिर कभी किसी के सामने दिखाई नहीं दिया।
राजमहल की ओर लौटकर चोर ने अपनी जान बचने पर ईश्वर का धन्यवाद किया — और रत्नावती को पता भी न चला कि उसके डर का अंत एक साधारण चोर की बुद्धि से हो गया था।
कहानी का संदेश:- moral story in hindi
डर कभी-कभी सत्य से बड़ा होता है। जो व्यक्ति अपने भय को समझ नहीं पाता, वह ऐसे भ्रम पैदा करता है जो उसकी हार का कारण बनते हैं।

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