Blind Hunchback Cured Princess Panchatantra Hindi Moral Story
उत्तरी दिशा में बसा था एक छोटा‑सा राज्य – मधुपुर। वहाँ के राजा मधुसेन ऐश‑ओ‑आराम में डूबे रहने वाले शासक थे। समय बीतते‑बीतते उनके घर एक बेटी पैदा हुई, पर उसके जन्म के साथ ही महल में हलचल मच गई, क्योंकि उस कन्या के तीन स्तन थे।

Blind Hunchback Cured Princess Panchatantra Hindi Moral Story
राजा घबरा गए और गुप्त रूप से दासियों से बोले –
“इस बच्ची को दूर किसी जंगल में छोड़ आओ, कोई भी इसके जन्म का राज न जान पाए।”
दासियाँ बोलीं – “महाराज, इतना बड़ा फ़ैसला लेने से पहले किसी विद्वान ब्राह्मण से विचार कर लें। जो हमेशा ज्ञानी लोगों से पूछता और सही बात को अपनाता है, उसकी बुद्धि सूरज की किरणों से खिलती कमलिनी की तरह बढ़ती रहती है।”
उन्होंने एक पुरानी घटना का ज़िक्र किया –
किसी निर्जन वन में चंडकर्मा नाम का भयंकर राक्षस रहता था। एक दिन जंगल में घूमते एक ब्राह्मण पर वह अचानक कूद पड़ा और उसके कंधे पर सवार हो गया।
राक्षस बोला, “चल आगे!”
डरे‑सहमे ब्राह्मण ने हिम्मत जुटाकर पूछा – “आपके पाँव इतने कोमल क्यों हैं?”
राक्षस ने बताया – “मैंने व्रत लिया है कि गीले पैरों से ज़मीन को नहीं छूऊँगा।”
कुछ दूर जाकर वे एक सरोवर के किनारे पहुँचे। राक्षस ने कहा, “मैं स्नान और देव‑पूजा कर के आता हूँ, तुम यहीं ठहरना, हिलना मत।”
ब्राह्मण ने मन‑ही‑मन सोचा – “यह पूजा करके मुझे खा जायेगा। अगर अभी भाग जाऊँ तो यह अपने व्रत के डर से पीछे नहीं आ सकेगा।”
वह दौड़ पड़ा और राक्षस, पैरों के भीगने के भय से, बस खड़ा देखता रह गया। इस तरह साधारण‑से सवाल ने उसे रास्ता दिखा दिया।
दासियों ने निष्कर्ष निकाला –
“देखिए, समझदार आदमी भी दूसरों से पूछकर ही बचाव का रास्ता निकालता है, ब्राह्मण तो राक्षस के चंगुल से भी इसी तरह बच निकला था।”
राजा ने बात मानकर ब्राह्मणों को बुलाया और पूछा –
“मेरे घर तीन स्तनों वाली कन्या का जन्म हुआ है, इसका क्या उपाय है?”
वे बोले –
“ऐसी कन्या जो शारीरिक रूप से असामान्य हो, वह प्रायः अपने पति या कुल पर विपत्ति लाती है। विशेष रूप से तीन स्तनों वाली कन्या अगर अपने पिता की नज़र में आ जाए, तो उसके लिए घातक सिद्ध होती है, इसमें संदेह नहीं। इसलिए आप स्वयं इसे कभी न देखें। यदि कोई व्यक्ति इससे विवाह करने को तैयार हो, तो इसे दान देकर राज्य से बाहर भेज दीजिए, तभी आपका हित होगा।”
राजा ने डंके की चोट पर ऐलान करा दिया –
“जो कोई भी त्रिस्तनी राजकन्या से विवाह करेगा, उसे एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ दी जाएँगी और उसे राज्य से बाहर भेज दिया जाएगा।”
घोषणा तो हुई, पर महीनों गुजर गये, कोई भी ऐसी कन्या को अपनाने को राज़ी न हुआ। राजकन्या गुप्त स्थान पर, महल के इर्द‑गिर्द ही, छिपाकर बड़ी की जाने लगी।
इसी नगर में एक निर्धन अंधा रहता था। उसके साथ मंथरक नाम का एक कुबड़ा था, जो लाठी पकड़े आगे चलता और उसे रास्ता दिखाता। दोनों ने मुनादी सुनी तो आपस में बोले –
“अगर किस्मत से राजकन्या मिल जाए, तो सोने के सहारे हमारा पेट तो भरेगा, ज़िंदगी आराम से कट जाएगी। अगर उस कन्या के दोष से मेरी जान भी चली गई, तो भी गरीबी के दुख से तो छुटकारा मिलेगा।”
वे कहते हैं – “लज्जा, स्नेह, मीठी वाणी, बुद्धि, जवानी, अच्छे रिश्ते, धर्म‑कर्म, स्वास्थ्य – ये सब तभी टिकते हैं जब पेट भरा हो।”
अंधे ने जाकर ढोल बजाने वाले से मुनादी रुकवाई और कहा –
“अगर राजा अनुमति दें, तो मैं राजकन्या से विवाह करूँगा।”
राजा तक बात पहुँची, तो उन्होंने स्पष्ट कहा –
“चाहे वह अंधा हो, बहरा हो, कोढ़ी हो या चांडाल, जो भी राजकन्या को स्वीकार करे, उसे एक लाख स्वर्ण मुद्राओं के साथ देश निकाला दिया जाएगा।”
राजआदेश के अनुसार नदी किनारे विधिवत् विवाह हुआ, स्वर्ण मुद्राएँ सौंपी गईं और अंधे, कुबड़े तथा राजकन्या – तीनों को नाव पर बैठाकर नाविकों से कहा गया –
“इन्हें किसी पराए देश के नगर में उतार देना।”
कई दिनों की यात्रा के बाद वे एक अनजान नगर पहुँचे। स्वर्ण से उन्होंने एक सुंदर भवन खरीद लिया और तीनों वहाँ बस गये। अंधा सारा समय बिस्तर पर पड़ा रहता, सारा काम‑धंधा मंथरक कुबड़ा संभालता। धीरे‑धीरे महल जैसा घर, आरामदायक जीवन और नज़दीकी साथ ने राजकन्या और कुबड़े के बीच अनुचित संबंध की नींव रख दी।
कहा भी गया है – “अगर आग ठंडी पड़ जाए, चाँद तपने लगे और समुद्र का पानी मीठा हो जाए, तभी स्त्रियों का सतीत्व डिगे बिना रह सकता है।”
एक दिन त्रिस्तनी ने कुबड़े से कहा –
“हे प्रिय, अगर किसी तरह यह अंधा मर जाए तो हम दोनों चैन से रह सकेंगे। कहीं से ज़हर का इंतज़ाम करो, बाकी मैं देख लूँगी।”
दूसरे दिन मंथरक को घूमते‑फिरते एक मरा हुआ काला साँप दिखा। वह उसे खुशी‑खुशी घर ले आया और बोला –
“सुंदरी, यह काला साँप मिला है। इसके टुकड़े कर, सोंठ‑मिर्च डालकर स्वादिष्ट व्यंजन बना दो और अंधे को मछली का मांस बताकर खिला देना। उसे मछली बहुत पसंद है, यह खाते ही मर जायेगा।”
इतना कहकर वह बाहर निकल गया। त्रिस्तनी ने चूल्हा जलाया, साँप के टुकड़े कर मट्ठे में चढ़ा दिये और फिर दूसरे कामों में लग गई। उसने अंधे के पास जाकर मीठे स्वर में कहा –
“आर्यपुत्र! आज आपके लिए खास मछली बन रही है, जिसे आप बार‑बार याद करते थे। जब तक मैं बाकी काम निपटा लूँ, आप कृपया कड़ाही को चलाते रहिए, वरना वह जल जाएगी।”
मछली के नाम से ही अंधा ललचा उठा। वह उठकर कड़ाही के पास आया और चलाने लगा। धीरे‑धीरे साँप के ज़हरीले मांस की भाप उसकी आँखों पर लगी उस काली झिल्ली को गलाने लगी। उसे आँखों में हल्की‑सी रोशनी महसूस हुई तो उसने और झुककर भाप लेनी शुरू कर दी। कुछ ही देर में उसकी दृष्टि पूरी तरह लौट आई।
जब उसने साफ‑साफ देखा कि कड़ाही में मछली नहीं, बल्कि काले साँप के टुकड़े मट्ठे में पक रहे हैं, तो उसका मन सिहर उठा –
“इसने मुझसे झूठ क्यों बोला? क्या यह मुझे मारना चाहती है? या इसके पीछे कुबड़े का दिमाग है?”
सच जानने के लिए उसने तुरंत अपने जागने का राज़ छिपा लिया और पहले की तरह अंधे की एक्टिंग करता रहा। थोड़ी देर में कुबड़ा भी लौट आया। सुरक्षित जगह समझकर वह बिना हिचकिचाए त्रिस्तनी को आलिंगन और चुम्बन करने लगा। अंधी आँखों वाला कहलाने वाला वह व्यक्ति ये सब साफ‑साफ देख रहा था, पर वह चुपचाप सही मौका देखता रहा।
जब उसे पास में कोई हथियार न दिखा, तो उसने अचानक मौका पकड़ा। वह पहले की तरह टटोलते हुए उनकी शय्या के पास पहुँचा और बिना आहट दिए मंथरक के दोनों पैर कसकर पकड़ लिए। उसने पूरी ताकत से कुबड़े को अपने सिर के ऊपर घुमाया और जोर से त्रिस्तनी की छाती पर पटक दिया।
इस एक ही वार से दो चमत्कार हो गए –
राजकन्या का तीसरा स्तन सीने के भीतर धँसकर सामान्य हो गया और कुबड़े की टेढ़ी कमर सीधी हो गई।
कहानी सुनाने वाले ने यहीं निष्कर्ष निकाला –
“देखा, अंधा और कुबड़ा जैसे कमज़ोर लगने वाले भी समय आने पर हालात पलट सकते हैं। पर असली बात यह है कि मनुष्य को सत्पुरुषों की बात माननी चाहिए और ज़िद में आकर उल्टा आचरण नहीं करना चाहिए, वरना अंत में विनाश ही हाथ आता है।
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