Foolish Frog King Gangu Moral Story in Hindi | Snake Betrayal Kahani

 Foolish Frog King Gangu Moral Story in Hindi | Snake Betrayal Kahani

एक गहरे कुएं में ढेर सारे मेंढक बसते थे। उनका सरदार था गंगू, जो बेहद झगड़ालू और जिद्दी स्वभाव का था। आसपास के दो-चार कुओं में भी मेंढकों की बस्तियां थीं, हर एक का अपना सरदार। गंगू का हर दूसरे सरदार से किसी न किसी बहाने से झगड़ा लगा रहता। अपनी बेवकूफी में गलत काम शुरू कर देता, और जो समझदार मेंढक रोकते, उन्हें अपने गुर्गों से पिटवा देता। कुएं के मेंढकों में गंगू के खिलाफ गुस्सा भड़क रहा था। घर में भी झगड़े से चैन न था, हर परेशानी का ठीकरा सबके सिर फोड़ा करता।

Foolish Frog King Gangu Moral Story in Hindi | Snake Betrayal Kahani
Foolish Frog King Gangu Moral Story in Hindi | Snake Betrayal Kahani


एक बार पड़ोसी कुएं के सरदार से उसका भयंकर विवाद हो गया। खूब बकझक हुई। कुएं लौटकर गंगू ने चिल्लाया कि पड़ोसी ने उसका बेइज्जती की है। बदला लेने को उसने अपनी फौज को पड़ोसी कुएं पर हमले का हुक्म दिया। सब जानते थे कि झगड़ा गंगू ने ही ठान लिया होगा।


कुछ होशियार और समझदार मेंढकों ने एकजुट होकर कहा, "सरदार जी, उनके कुएं में हमसे दोगुने मेंढक हैं। वे तंदुरुस्त और हमसे ज्यादा ताकतवर। हम ये जंग नहीं लड़ेंगे।


गंगू दंग रह गया और गुस्से से तड़प उठा। मन ही मन ठान लिया कि इन गद्दारों को ठीक करना है। उसने अपने बेटों को बुलाया और भड़काया, "बेटो, पड़ोसी सरदार ने अपने बाप का अपमान किया। जाओ, उनके बेटों की ऐसी धुनाई करो कि वे दया मांगें।


बेटे एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। आखिर बड़े बेटे ने कहा, "पिताजी, आपने हमें कभी टर्राने नहीं दिया। टर्राहट से ही मेंढकों को ताकत, हिम्मत और उत्साह मिलता है। बिना जोश के हम क्या कर पाएंगे?


गंगू अब सबसे ज्यादा चिढ़ गया। एक दिन गुस्से में बड़बड़ाता कुएं से बाहर निकला और इधर-उधर भटकने लगा। अचानक पास के बिल में एक खूंखार सांप घुसता दिखा। गंगू की आंखों में चमक आ गई। दुश्मन को दोस्त बनाओ, ये सोचकर वह बिल के पास पहुंचा और बोला, "सांप भैया, प्रणाम।"


सांप फुफकारा, "मेंढक, तू मेरा शिकार है। तुझे निगल जाऊंगा, और तू मेरे द्वार पर खड़ा चिल्ला रहा है?


गंगू ने टर्राया, "सांप राजा, कभी अपने लोग दुश्मन से बदतर हो जाते हैं। मेरी अपनी कौम और रिश्तेदारों ने इतना बेइज्जत किया कि सबक सिखाने को मुझे तुम्हारी मदद मांगनी पड़ रही। मेरी यारी मान लो, फायदा होगा।


सांप ने सिर बाहर निकाला, "फायदा कैसा?


गंगू बोला, "मैं इतने मेंढक खिलाऊंगा कि तुम पित्तल से सोना बन जाओगे।


सांप ने शक किया, "पानी में कैसे उतरूंगा? कैसे पकड़ूंगा?


गंगू ने तालियां बजाईं, "यहीं मेरी दोस्ती काम आएगी। मैंने जासूसों से गुप्त सुरंगें बनवाई हैं जो हर कुएं तक जाती हैं। उनके मिलने की जगह एक गुप्त कमरा है। वहां बैठो, और जितने कहूं, उतने खाते जाओ।


सांप खुश हो गया, क्योंकि इसमें उसका फायदा साफ था। मूर्ख बदला लेने को अंधा हो तो दुश्मन क्यों न लूट ले?


सांप गंगू के साथ कमरे में बैठा। गंगू ने पहले पड़ोसी सरदारों और उनकी प्रजाओं को खाने को कहा। कुछ हफ्तों में सांप ने सब निगल लिया। फिर बोला, "अब कौन? पेट भरा रखने की आदत हो गई।


गंगू ने कहा, "अब मेरे कुएं के समझदारों को खाओ।


वे खत्म हुए तो प्रजा की बारी। गंगू ने सोचा, "प्रजा तो शिकायतबाज है, उन्हें भी ठीक।" प्रजा खतम होने पर सांप ने कहा तो गंगू बोला, "अब सिर्फ मेरा खानदान बचा। खेल समाप्त।


सांप फन फैलाकर गरजा, "अब तू ही इंतजाम कर, वरना तुझे ही खा लूंगा।


गंगू डर गया। पहले अपने दोस्तों को खिलाया, फिर बेटों को। सोचा, "बेटे नए पैदा कर लूंगा।" बेटे गए तो सांप ने अपनी पत्नी की ओर इशारा करवाया। गंगू ने खुद को तसल्ली दी, "बुढ़िया गई, नई लाऊंगा।


पत्नी निगली गई। सांप ने मांह फाड़ी, "और!


गंगू गिड़गिड़ाया, "अब सिर्फ मैं बचा, तुम्हारा यार गंगू। जाओ न।


सांप हंसा, "यार कौन सा रिश्ता है?" और उसे भी निगल गया।


नैतिक शिक्षा: बदले की जिद में मूर्खता अपनों को बर्बाद कर देती है। दुश्मन कभी अपना नहीं बनता।

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