Chanakya Neeti Goat Thugs Trick Moral Story Hindi

 Chanakya Neeti Goat Thugs Trick Moral Story Hindi

kids moral story
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एक छोटे से शांतिपूर्ण गांव में संभुदयाल नाम का एक सज्जन ब्राह्मण रहता था। वह धार्मिक कार्यों में रत रहता और अपने यजमानों की सेवा से प्रसन्न होता। एक दिन, होली के पर्व पर उसके एक यजमान ने उसे भेंट स्वरूप एक मोटा-ताजा बकरा दिया। संभुदयाल ने खुशी-खुशी उस बकरे को कंधे पर लादा और अपने घर की ओर चल पड़ा। रास्ता पहाड़ी और जंगली इलाके से होकर गुजरता था – लंबा, सुनसान, जहां चारों ओर घने पेड़ों की छांव थी और दूर-दूर तक कोई इंसानी आबादी नजर न आती।

सूरज ढलने लगा था, और हवा में ठंडक घुलने लगी। तभी रास्ते के मोड़ पर उसे तीन चालाक ठग दिखे। वे छिपे हुए थे और ब्राह्मण के कंधे पर लदे बकरे को देखते ही लार टपकाने लगे। उन्होंने फुसफुसाते हुए योजना बनाई – सीधे छीनने की बजाय चालाकी से बेवकूफ बनाना। पहले ठग ने आगे बढ़कर ब्राह्मण को रोका और मासूम बनते हुए बोला, "अरे पंडित जी, आप तो बड़े विद्वान हैं! फिर भी ये क्या अनर्थ कर रहे हैं? अपने पवित्र कंधों पर कुत्ता लादे हुए हैं? ब्राह्मण कुल में ऐसा कैसे शोभता है?"

संभुदयाल ने गुस्से से उसे घूरा और झिड़कते हुए कहा, "अरे अंधे! आंखें खोल लो! ये चमचमाता बकरा है, कुत्ता कहां से आ गया? जाओ अपनी राह!" ठग मुस्कुराया और बोला, "खैर, मैंने तो बस भलाई बताई। अगर आपको कुत्ता ही अच्छा लगे तो ले जाइए, मुझे क्या पड़ी है।" ब्राह्मण आगे बढ़ गया, लेकिन मन में थोड़ी बेचैनी हो गई।

कुछ दूर चलने पर दूसरा ठग सामने आ गया। वह और भी चालाक था। उसने ब्राह्मण के पैरों पर गिरते हुए कहा, "पंडित जी, उच्च कुल के आप जैसे महान पुरुष को कुत्ते को कंधे पर क्यों लाद रखा है? ये तो कुलनाश का काम है! क्या कोई मजबूरी है?" संभुदयाल ने फिर झल्ला कर कहा, "तुम भी वही पुरानी बात? ये बकरा है बेवकूफ! ऊंच-नीच समझो!" ठग ने सिर हिलाते हुए कहा, "जी जैसा आप कहें। लेकिन कुल की मर्यादा का ध्यान रखिएगा।" ब्राह्मण ने उसे धक्का देकर आगे बढ़ लिया, पर अब मन में शक का बीज बो चुका था।

अब सूरज लगभग अस्त हो चुका था, और रास्ता और भी अंधेरा। तीसरा ठग आ गया – सबसे चतुर। उसने ब्राह्मण को देखते ही चिंतित स्वर में कहा, "हे ब्राह्मण देव! आपकी पवित्र पीठ पर ये गंदा कुत्ता क्यों? क्या यजमान ने आपको धोखा दिया? कुलाचार नष्ट हो जाएगा ऐसा!" इस बार संभुदयाल का मन डगमगा गया। तीन-तीन लोग एक ही बात कह रहे हैं। उसने कंधे झुकाकर बकरे को देखा – अंधेरे में उसकी सफेद ऊन कुत्ते जैसी ही लग रही थी। "सच तो ये है कि मैं कुत्ता ही ले जा रहा हूं!" सोचकर वह शर्म से लाल हो गया।

बिना देर किए, उसने बकरे को सड़क किनारे उतार दिया और तेज कदमों से घर भागा। इधर तीनों ठग हंसते-हंसते बकरे पर टूट पड़े। उन्होंने उसे मार डाला और चट कर गए – रोटियां सेंककर, मसालेदार तरीके से दावत उड़ाई।

चाणक्य नीति का संदेश: बुद्धिमान व्यक्ति एक बार सुन ले, लेकिन मूर्ख बार-बार सुनकर भी भ्रमित हो जाता है। संदेह की जड़ें गहरी हो जाती हैं जब बार-बार एक ही बात कही जाए। इसलिए हमेशा विवेक से काम लो, न कि भीड़ की बातों पर।




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