प्राचीन काल में एक विशाल और भव्य राजमहल था, जहां एक शक्तिशाली राजा राज्य करता था। उसका राज्य समृद्धि और शांति से भरा था, लेकिन राजा का सबसे करीबी साथी कोई मनुष्य नहीं, बल्कि एक चतुर और वफादार बंदर था। यह बंदर बचपन से ही राजमहल में पला-बढ़ा था। राजा ने उसे अपना भक्त और सेवक बना लिया था। बंदर की चालाकी, निष्ठा और राजा के प्रति अटूट समर्पण के कारण वह राजमहल के हर कोने में स्वतंत्र घूमता था। यहां तक कि राजा के निजी अंतःपुर में भी कोई उसे रोकता नहीं था। रानी और दासियां उसे प्यार करतीं, और वह राजा की सेवा में दिन-रात लगा रहता। राजा उसे अपना भाई मानते थे और कभी-कभी अपनी गोपनीय बातें भी साझा कर लेते।
एक गर्म ग्रीष्मकालीन दोपहर की बात है। सूरज अपनी पूरी तपish बरसा रहा था, और राजमहल के आंगन में ठंडक के लिए पानी की छींटें मार रही थीं। राजा थकान से चूर होकर अपने शीतल शयनकक्ष में गहरी नींद में सोए हुए थे। उनका विशाल पलंग बारीक सिल्क के चादरों से ढका था, और कमरे में सुगंधित अगरबत्ती जल रही थी। बंदर, जैसा हर रोज की तरह, राजा के पास बैठा पंखा झला रहा था। उसकी लंबी पूंछ हवा में लहरा रही थी, और आंखें राजा की सेवा में लगी हुईं। तभी बंदर की नजर पड़ी एक छोटी सी काली मक्खी पर, जो बार-बार राजा की नंगी छाती पर आकर बैठ जाती थी।
बंदर ने पहले पंखे से उसे उड़ाने की कोशिश की। हवा की तेज झोंके से मक्खी थोड़ी देर हट जाती, लेकिन जिद्दी स्वभाव से फिर लौट आती। वह राजा के चेहरे के पास भिनभिनाती, फिर छाती पर उतर पड़ती। बंदर का मन खटकने लगा। "यह मक्खी मेरे स्वामी को कष्ट दे रही है! मैं इसे बर्दाश्त नहीं करूंगा," उसने सोचा। उसकी आंखों में क्रोध की लालिमा छा गई। राजा के प्रति उसकी भक्ति ऐसी थी कि वह खुद को राजा का रक्षक समझता था। लेकिन बंदर की बुद्धि में एक खामी थी – वह आवेश में आकर सोच-विचार किए बिना काम कर देता था।
क्रोध के वशीभूत होकर बंदर ने पंखा फेंक दिया। पास ही राजा की तलवार रखी हुई थी, जो सोने की म्यान में चमक रही थी। बंदर ने उसे उठा लिया। तलवार उसके छोटे हाथों में भारी लग रही थी, लेकिन क्रोध ने उसे ताकत दे दी। वह धीरे से झुका, मक्खी का इंतजार करने लगा। तभी मक्खी फिर राजा की छाती पर बैठ गई – भिनभिनाते हुए रस चूसने लगी। बंदर ने पूरे जोर से तलवार का प्रहार किया! तेज धार वाली तलवार हवा को चीरती हुई नीचे गिरी। मक्खी तो चटकते ही उड़ गई, लेकिन तलवार राजा की कोमल छाती में धंस गई। खून की धार बहने लगी, और राजा की छाती दो टुकड़ों में बंट गई। राजा की नींद टूटते ही दर्द से उनकी आंखें खुलीं, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। वे एक क्षण राजा को घूरते हुए चीखे, फिर श्वास रुक गई। राजमहल में हाहाकार मच गया – रानी रोने लगीं, सेवक दौड़े, लेकिन राजा को बचा न सके।
बंदर स्तब्ध खड़ा था। तलवार उसके हाथ से गिर गई। उसकी आंखों में पछतावा था, लेकिन अब कुछ न बचा था। वह भागा, लेकिन पकड़ा गया। राजा का अंतिम संस्कार हुआ, और राज्य में शोक की लहर दौड़ गई। बंदर को दंडित किया गया, लेकिन उसकी भक्ति सब जानते थे।
इस कहानी से सीख मिलती है कि अति भक्ति या क्रोध में बिना सोचे-समझे लिया गया निर्णय कितना घातक हो सकता है। अच्छे इरादे भी गलत तरीके से लागू हों तो विनाशकारी साबित होते हैं। हमें हर काम में विवेक और धैर्य रखना चाहिए।

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