एक घने जंगल के बीचों-बीच, जहाँ ऊँचे-ऊँचे पेड़ आसमान को छूते थे, एक पुराने पीपल के पेड़ पर एक छोटा-सा घोंसला टिका हुआ था। उस घोंसले की मालकिन थी एक चतुर गौरैया, जिसका नाम था चिंकी। चिंकी सालों से इसी पेड़ पर रहती आ रही थी। वह जंगल के हर राज़ से वाकिफ थी – कौन-सी डालियाँ मजबूत हैं, कहाँ फल मिलते हैं, और कैसे मौसम की मार झेलनी है। सर्दियों का मौसम आ गया था, और उस रात कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। हवा तेज़ चल रही थी, जो पत्तियों को सरसराहट के साथ उड़ा ले जा रही थी। चिंकी अपने घोंसले में पंख समेटे दुबकी हुई थी, लेकिन ठंड उसके पंखों को भी चीर रही थी।

Monkeys Mistake Firefly for Fire | जुगनू को चिंगारी समझे बंदर | Moral Story in Hindi | Panchatantra Tale
नीचे पेड़ की जड़ों के पास, ठंड से काँपते हुए चार-पाँच बंदर इकट्ठा हो गए। उनके बाल जम चुके थे, दाँत टकरा रहे थे, और साँसें भाप बनकर उड़ रही थीं। इनमें से सबसे बड़ा बंदर था भोलू, जो ग्रुप का लीडर था। भोलू ने काँपते होंठों से कहा, "भाइयो, ये ठंड हमें मार डालेगी। कहीं से आग का जुआ जल जाए तो जान में जान आ जाए। लेकिन यहाँ तो लकड़ी-पत्तियाँ तो हैं ही, बस चिंगारी चाहिए।"
दूसरा बंदर, चालाक मिजाज का चिंटू, ने चारों ओर नजर दौड़ाई। जमीन पर सूखी पत्तियाँ, टहनियाँ और पुराने पत्तों का ढेर सा लग रहा था। उसने उत्साह से कहा, "अरे भोलू भैया, देखो तो! ये सारी सूखी चीजें इकट्ठी करके एक बड़ा सा ढेर बना लो। फिर किसी तरह इसे सुलगा दो। फूंक मार-मारकर आग भड़क जाएगी। चलो, सब मिलकर काम शुरू करते हैं!"
बंदरों ने तुरंत काम पर लग गए। उन्होंने आसपास की सूखी घास, पत्तियाँ, छोटी-छोटी टहनियाँ इकट्ठी कीं और पेड़ के नीचे एक मजबूत ढेर बना दिया। ढेर इतना बड़ा था कि वे सब उसके चारों ओर गोल-गोल बैठ सके। अब समस्या थी – इसे कैसे सुलगाएँ? सब चुपचाप सोचने लगे। भोलू ने कहा, "किसी ने आग जलाना सीखा है? कोई चिंगारी, कोई जादू?"
तभी, चिंटू की नजर हवा में उड़ते एक चमकते जुगनू पर पड़ी। जुगनू ठंडी रात में अपनी पीली रोशनी फैला रहा था, मानो कोई तारा जमीन पर उतर आया हो। चिंटू उछल पड़ा और चिल्लाया, "देखो! देखो! हवा में चिंगारियाँ उड़ रही हैं। ये तो आग के टुकड़े हैं। इन्हें पकड़ लो, ढेर के बीच में डालो, थोड़ी फूंक मारो – आग लग जाएगी!"
"हाँ-हाँ!" सब बंदर एक साथ चिल्लाए। वे हवा में हाथ-पैर लहराते हुए जुगनू के पीछे दौड़ पड़े। पेड़ पर चिंकी यह सब देख रही थी। उसे हँसी आ रही थी, लेकिन दया भी। वह समझ गई कि ये मूर्ख बंदर जुगनू को चिंगारी समझ रहे हैं। चिंकी चुप न रह सकी। उसने मीठी आवाज में पुकारा, "अरे बंदर भाइयों, रुको! वो चिंगारी नहीं, जुगनू है। जुगनू से आग नहीं जलती। ये तो बस कीड़ा है जो रोशनी करता है।"
भोलू ने गुस्से से ऊपर देखा और गुर्राया, "तू चुप रह, छोटी चिड़िया! तेरी क्या समझ? हम बड़े-बड़े बंदर हैं, तू घोंसले में छुपी रह। हमें मत सिखा!"
इतने में चिंटू ने उछलकर जुगनू को पकड़ लिया। उसने अपनी हथेलियों को कटोरे की तरह जोड़कर जुगनू को कैद कर लिया। जुगनू फड़फड़ा रहा था, लेकिन बंदरों को क्या फर्क पड़ता? उन्होंने उसे ढेर के बीच में रख दिया। अब सब बंदर चारों तरफ से फूंक मारने लगे। "फूँ-फूँ!" हवा का शोर गूँजने लगा। लेकिन कुछ नहीं हुआ। जुगनू तो बस थोड़ा चमक रहा था, आग कहाँ बनने वाली थी?
चिंकी फिर बोली, "भाइयों, ये बेकार है। जुगनू से आग नहीं सुलगती। दो पत्थर उठाओ, उन्हें जोर से टकराओ। चिंगारी निकलेगी, फिर आग लग जाएगी। मैंने खुद देखा है जंगल में!"
बंदरों ने उसे घूरा, लेकिन कोशिश की। पत्थर टकराए, लेकिन चिंगारी न निकली – शायद गलत पत्थर थे। आग न सुलगी तो सब और चिढ़ गए। चिंकी ने फिर सलाह दी, "अच्छा, कम से कम दो सूखी लकड़ियाँ तो रगड़ो। घर्षण से गर्मी पैदा होगी, आग लग सकती है। ये तरीका पुराना है, आजमाओ!"
भोलू का गुस्सा अब सिर पर चढ़ आया। वह खीझा हुआ आगे बढ़ा, चिंकी को पकड़ लिया और जोर से पेड़ के तने पर दे मारा। चिंकी फड़फड़ाती हुई नीचे गिरी। उसके पंख टूट गए, साँसें थम गईं। वह मर गई। बंदर चुपचाप बैठे रहे, ठंड फिर काटने लगी। आग न जल सकी, और न ही चिंकी लौटी।
सुबह हुई तो जंगल के बाकी जानवर इकट्ठे हो गए। उन्होंने बंदरों को बताया कि चिंकी जंगल की सबसे बुद्धिमान चिड़िया थी। उसकी सलाह मानते तो आग जल जाती। बंदर शर्मिंदा हुए। भोलू ने सिर झुकाया, "हमने बुद्धि को ताकत से हरा दिया। आज से सीख लेंगे – ज्ञान की कद्र करो, न कि क्रोध की।"
नैतिक सीख
बुद्धि और ज्ञान से बड़ी कोई ताकत नहीं। जो सलाह दे, उसे सुनो, न कि क्रोध में खो जाओ। जंगल ने उस दिन सिखाया कि अज्ञानता सबसे बड़ा दुश्मन है।
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